समस्तीपुर: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दौरे, प्रगति यात्रा और अब समृद्धि योजना के तहत समस्तीपुर को करोड़ों रुपये की विकास योजनाओं की सौगात जरूर मिली है। मंच से सड़क, पुल, भवन, नल-जल और अन्य योजनाओं की घोषणाएं हुईं और जिले के विकास का खाका खींचा गया। लेकिन इन चमकदार दावों के पीछे समस्तीपुर की धरती पर एक ऐसी सच्चाई मौजूद है, जो न सिर्फ चौंकाती है बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
समस्तीपुर के मुक्तापुर स्थित भागवतपुर में दरभंगा महाराज द्वारा स्थापित ऐतिहासिक जूट मिल, जिसे केवल समस्तीपुर ही नहीं बल्कि पूरे बिहार की औद्योगिक धरोहर के रूप में देखा जाता है, पिछले चार महीनों से पूरी तरह बंद पड़ी है। यह वही जूट मिल है, जिसने दशकों तक उत्तर बिहार की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी, हजारों मजदूरों को रोजगार दिया और समस्तीपुर को औद्योगिक पहचान दिलाई। आज उसी मिल के विशाल परिसर में सन्नाटा पसरा है, फाटकों पर ताले लटक रहे हैं और भीतर की मशीनें धीरे-धीरे जंग खा रही हैं।
जूट मिल के बंद होने का असर केवल एक फैक्ट्री तक सीमित नहीं है। इससे सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हजारों मजदूर और उनके परिवार आज गहरे संकट में हैं। मजदूरों का कहना है कि काम बंद होने के बाद उनके सामने रोजी-रोटी का कोई विकल्प नहीं बचा। महीनों से आमदनी शून्य है, बची-खुची जमा पूंजी खत्म हो चुकी है और अब हालात ऐसे बन गए हैं कि कई परिवारों को एक वक्त का खाना जुटाना भी मुश्किल हो रहा है। बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही है, इलाज कराना भारी पड़ रहा है और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि भागवतपुर जूट मिल कभी पूरे इलाके की धड़कन हुआ करती थी। आसपास के बाजार, छोटे दुकानदार, ट्रांसपोर्ट और कच्चे माल से जुड़े लोग भी इसी मिल पर निर्भर थे। मिल बंद होने से पूरे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ गई हैं। यह केवल मजदूरों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे स्थानीय अर्थतंत्र का संकट बन चुका है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि मुख्यमंत्री के समस्तीपुर दौरे के दौरान, न तो इस जूट मिल की बदहाली पर कोई चर्चा हुई और न ही इसके पुनरुद्धार को लेकर कोई ठोस घोषणा सामने आई। विकास योजनाओं की लंबी सूची में बिहार की इस ऐतिहासिक औद्योगिक धरोहर का नाम तक नहीं लिया गया। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है। मजदूर पूछ रहे हैं कि जब सरकार रोजगार सृजन और औद्योगिक विकास की बात करती है, तो फिर एक चालू-हो सकने वाली जूट मिल को बंद पड़ा क्यों रहने दिया जा रहा है।
औद्योगिक और श्रम विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार इच्छाशक्ति दिखाए, तो भागवतपुर जूट मिल को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इससे न सिर्फ हजारों मजदूरों को फिर से रोजगार मिलेगा, बल्कि बिहार की औद्योगिक विरासत भी सुरक्षित रह सकेगी। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ मिल की स्थिति और खराब होती जा रही है, जिससे इसके पुनरुद्धार की संभावना भी कमजोर पड़ती जा रही है।
आज समस्तीपुर में तस्वीर साफ है। एक तरफ करोड़ों रुपये की विकास योजनाओं की घोषणाएं हैं, दूसरी तरफ हजारों मजदूरों की जिंदगी अनिश्चितता और भूख के साए में गुजर रही है। भागवतपुर जूट मिल अब सिर्फ एक बंद कारखाना नहीं, बल्कि सरकारी उदासीनता, प्रशासनिक निष्क्रियता और विकास के खोखले दावों का प्रतीक बन चुकी है।
अब सवाल यह है कि क्या समस्तीपुर को मिलने वाली विकास की सौगातों में कभी इस जूट मिल और इसके मजदूरों की तकदीर भी शामिल होगी, या फिर बिहार की यह ऐतिहासिक धरोहर यूं ही उपेक्षा का शिकार होकर इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी।